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Essay on Badalta Hua Gramin Jivan & Desh Bhakti

आज के इस पोस्ट में हम बदलता हुआ ग्रामीण जीवन और देश भक्ति पर निबंध बताने वाला हूं। जो की अपलोगो को बेहद पसंद आएगा। ऐसे ही लेखों के लिए आप हमारे ब्लॉग पर विजिट करते रहें।

Essay on Badalta Hua Gramin Jivan : बदलता हुआ ग्रामीण जीवन पर लेख 

भारत गाँवों का देश है। पंत के शब्दों में-भारतमाता ग्रामवासिनी। हमारी सभ्यता और संस्कृति के इतिहास में गाँवों का विशेष स्थान तथा महत्व है। इस युग में भी ग्राम्य जीवन का आनन्द वर्णनातीत है। गाँव भारतीय संस्कृति के मेरुदण्ड हैं। गाँव से अनेक लाभ हैं। मनुष्य का स्वास्थ्य स्वच्छ वायु पर अवलम्बित है। बड़े-बड़े शहरों में स्वच्छ वायु का मिलना दुर्लभ ही नहीं नितान्त असम्भव है। नगर निवासियों को स्वच्छ वायु के सेवन के लिए प्रातः काल कई किलोमीटर का भ्रमण करना पड़ता है। 

उन्हें स्वच्छ वायु पूर्णरूप से प्राप्त नहीं होती। गाँव में प्रातः उठकर किसी ओर चले जाइये । शीतल, मन्द तथा सुगन्धित वायु का स्पर्श आपको नवीन स्फूर्ति, नवीन शक्ति प्रदान करेगी। खेतों के बीच में छोटी सी पगडण्डी पर चलना कितना आनन्द देता है। वहाँ सभी को स्वच्छ वायु सरलता से मिल जाती है। गाँव प्राकृतिक दृश्यों का आगार है। सभी ऋतुओं में नयनाभिराम दृश्य होते हैं। वर्षा में गाँव का सौन्दर्य देखकर तो मन-मयूर नृत्य करने लगता है। 


उद्यानों, वाटिकाओं की शोभा अकथनीय है। लहराते हुए हरे भरे खेत, श्यामल वृक्ष तथा लिपटी हुई इठलाती बल्लरियाँ देखने वालों के हृदय को नवीन उल्लास एवं हर्ष से परिपूर्ण कर देती है। सरोवरों में नाना भाँति के पुष्प और लताएँ अनुपम शोभा धारण करती हैं। पिक की पीयूष-वर्षिणी वाणी श्रुति पुटों में पीयूष उड़ेलती है। दादूरों तथा अन्य थलचर एवं नभचर प्राणियों की ध्वनि में माधुर्य घुला होता है। पंख फैलाये मोर की पीऊ- पीऊ की ध्वनि तथा मनोहर नृत्य हृदयग्राही होते हैं। कल कल ध्वनि से प्रवाहित होती हुई कल्लोलिनी से गाँव का सौन्दर्य द्विगुणित हो जाता है।


यही नहीं, सभी ऋतुओं में गाँव की शोभा निराली होती है। ग्रीष्म ऋतु में जब शहरों के रहने वाले पत्थर निर्मित घरों में प्रचण्ड सूर्य की तप्त किरणों से जला करते हैं, उस समय गाँव के कच्चे घर अति शीतल तथा सुखदायी होते हैं। ऋतुएँ गाँव को केवल सौन्दर्य ही प्रदान नहीं करती, वरन् सुखदायक भी होती हैं।


गाँव के भोले-भाले निवासी सरलता एवं सौम्यता की मूर्ति होते हैं। उनके जीवन का आधार ‘सादा जीवन उच्च विचार" होता है। उनकी वेशभूषा जैसी साधारण होती है वैसी ही बोलचाल भी। उनके खान-पान, उठने-बैठने आदि में अभी सरलता परिलक्षित होती है। नागरिकों की अपेक्षा उनका चरित्र भी श्रेष्ठ होता है। ये सभी दुर्गुणों से मुक्त होते हैं। उदारता, मार्मिकता, सच्चरित्रता आदि गुण तो उनके जीवन में कूट-कूट कर भरे रहते हैं। हृदय अत्यन्त निर्मल होता है।

अतिथि-सत्कार जैसा गाँव में होता है वैसा नगर में सम्भव नहीं है। अपरिचित व्यक्ति भी गाँव में नगर के परिचित व्यक्ति से अधिक आदर प्राप्त करता है। 


प्रकृति की गोद में पोषित होने के कारण ग्राम निवासी कपट, छल, असत्य आदि से प्रायः दूर रहते हैं। उनका जीवन अत्यन्त शान्तिपूर्ण एवं आदर्शमय होता है। गाँव में नगरों की तुलना में कुछ गुणों का अभाव भी होता है। यहाँ के निवासी अशिक्षित, अन्धविश्वासी तथा रूढ़िवादी होते हैं। अशिक्षा के कारण प्रायः पारस्परिक झगड़े भी चलते रहते हैं। 


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इसके अतिरिक्त स्वच्छता का अभाव गाँव में खटकने वाली वस्तु है। यदि सरकार इनकी उन्नति का विचार करे तो सबसे प्रथम शिक्षा के देशव्यापी प्रचार तथा अन्य सुधारों की आवश्यकता है। यदि गाँव से निर्धनता आज विलीन हो जाय तो रामराज्य का आनन्द प्राप्त हो जाए। अतः शिक्षा प्रसार की योजना से गाँव में रामराज्य की स्थापना हो सकती है। सरकारी योजनाओं तथा डिजिटल तकनीक के उपयोग के कारण ग्रामीण जीवन काफी बदल रहा है।


Essay on Desh Bhakti : देशभक्ति या स्वदेश प्रेम पर लेख

देशभक्ति या स्वेदश प्रेम राष्ट्र के कल्याण के लिए मरने और जीने का नाम है। एक देशभक्त अपने देश का सच्चा प्रेमी होता है। राष्ट्र और उसके निवासियों का कल्याण करना एक देशभक्त का सबसे बड़ा कर्त्तव्य होता है। हर देश ने ऐसे राष्ट्रभक्तों को उत्पन्न किया है। देश की स्वतंत्रता और उसका विकास ऐसे लोगों पर ही आधारित है। देश का चहुँमुखी विकास उसमें निवास करने वाले राष्ट्रभक्तों की संख्या पर निर्भर है। हम सभी अपनी मातृभूमि के ऋणी हैं। हमने यहाँ जन्म लिया है और इसकी मिट्टी पर बड़े हुए हैं। 


इसलिए हम सभी अपने देश की स्वतंत्रता और विकास के लिए उत्तरदायी हैं। अगर हम ईमानदार होंगे तो हमारा देश धनी और संपन्न होगा। हमारे जीवन का प्रमुख दायित्व अपने कर्त्तव्य के प्रति ईमानदारी तथा अधिकारों का बलिदान होना चाहिए। यह देशभक्ति का पहला कदम है। एक सच्चा देशभक्त प्राथमिक जिम्मेदारी से कुछ अधिक ही करता है, वह अपने जीवन और संपत्ति के बारे में कभी भी चिन्ता नहीं करता। वह अपना जीवन और सबकुछ अपने देश के लिए न्योछावर करने को सदा तैयार रहता है। 


उसका जीवन उसके अपने हित और अपने परिवार तक ही सीमित नहीं रहता। वह अपने देश और देशवासियों की सदैव चिन्ता करता है। राष्ट्रीय हित उसके निजी हित से बढ़कर है। राजनीतिक दलों और शासकों के मन में भी देशभक्ति की भावना रहनी चाहिए। अगर वे राष्ट्रहित की बात सोचेंगे तो देश का विकास कल्पना से परे होगा। आजकल विशेषतया भारत में बहुत कम लोग ही सच्चे राष्ट्रभक्त रह गये हैं। राजनीतिज्ञ और शासक सभी पहले अपने ही कल्याण के बारे में सोचते हैं। वे अपनी जेब भरने की फिराक में रहते हैं। देश के लिए यदि वे कुछ करते भी हैं, तो उनका उद्देश्य एक निश्चित लक्ष्य, चुनाव में मत प्राप्त करने तक, सीमित रहता है। 


उन्हें देश से न तो प्यार है और न ही उसके लिए दिल में कोई दर्द है। वे नकली देशभक्त हैं। वे स्वार्थी हैं। उनमें नैतिकता और बलिदान की उच्च भावना (संवेदना) नहीं है। एक सच्चे देशभक्त की उसके देशवासी इज्जत करते हैं। यहाँ तक कि उसकी पूजा भी करते हैं। उसकी भावना सिर्फ अपने देश तक ही नहीं सीमित रहती, बल्कि सारे विश्व तक उसका प्रसार होता है। वह मानव जाति के हित की बात सोचता है । इस दृष्टि से देखा जाय तो महात्मा गाँधी आदर्श देशभक्त थे। वे सिर्फ भारत के लिए ही नहीं मानव मात्र के आदर्श थे। सुभाष चन्द्र बोस, चन्द्रशेखर आजाद, भगत सिंह ऐसे देशभक्त थे जिन्होंने देश के ऊपर खुशी-खुशी अपने प्राण न्योछावर कर दिये । 


हमारे पूर्वजों में महाराणा प्रताप, शिवाजी, रानी लक्ष्मीबाई, वीर कुँवर सिंह और अन्य कई नाम हैं। एक देशभक्त मृत्यु के समक्ष भी साहसी और निर्भीक रहता है। राष्ट्र और विश्व का भविष्य राष्ट्रभक्तों पर निर्भर करता है। अगर किसी देश में राष्ट्रभक्तों की संख्या में वृद्धि होती है तो वह देश विश्व में विशिष्ट सम्मान प्राप्त करता है। एक सच्चा राष्ट्रभक्त सिर्फ अपने और देशवासियों के बारे में ही नहीं सोचता। वह मानव जाति और संपूर्ण विश्व के बारे में विचार करता है। महात्मा गाँधी ने ठीक ही कहा है- "मेरी राष्ट्रभक्ति में सारी

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